पत्नी की याचिका हाईकोर्ट से खारिज, फैमिली कोर्ट का आदेश बरकरार
जबलपुर। वैवाहिक विवाद से जुड़े एक अहम मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने बच्ची के DNA टेस्ट को चुनौती देने वाली पत्नी की याचिका खारिज कर दी है। हाईकोर्ट के जस्टिस विवेक जैन की अदालत ने स्पष्ट किया कि इस मामले में फैमिली कोर्ट जबलपुर द्वारा दिया गया DNA टेस्ट का आदेश कानूनी और उचित है। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि पत्नी DNA सैंपल देने से इनकार करती है, तो फैमिली कोर्ट को धारा 114(h) भारतीय साक्ष्य अधिनियम या भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (BSA) के तहत प्रतिकूल अनुमान (Adverse Presumption) लगाने की स्वतंत्रता होगी। अदालत के इस फैसले के बाद अब बच्ची का DNA टेस्ट कराए जाने का रास्ता साफ हो गया है।
क्या है पूरा मामला
पत्नी ने फैमिली कोर्ट के 18 अगस्त 2022 के आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें पति की अर्जी स्वीकार करते हुए यह निर्देश दिया गया था कि शादी के बाद जन्मी बच्ची का DNA टेस्ट कराया जाए, ताकि उसकी जैविक पिता की पुष्टि हो सके। पत्नी की ओर से तर्क दिया गया कि DNA टेस्ट से बच्ची की निजता (Right to Privacy) और वैधता (Legitimacy) प्रभावित होगी। साथ ही, यह बच्ची के सर्वोत्तम हितों के खिलाफ है। इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के फैसले Aparna Ajinkya Firodia बनाम Ajinkya Arun Firodia (2024) का हवाला दिया गया और कहा गया कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 के तहत वैधता की मजबूत धारणा को हल्के में नहीं तोड़ा जा सकता।
मैं ड्यूटी पर था तो पत्नी कैसे हुई गर्भवती!
दूसरी ओर पति की और से अधिवक्ता शीतल तिवारी ने कहा कि पत्नी ने महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाया है। यह दोनों के बीच तीसरी तलाक याचिका है। पति भारतीय सेना में पदस्थ है और गर्भधारण की अवधि के दौरान वह पत्नी से नहीं मिला। गर्भधारण की जानकारी चार दिन में मिलने और आठ महीने में प्रसव जैसे तथ्यों को चिकित्सकीय रूप से असंभव बताते हुए पति ने DNA टेस्ट की मांग की है।
हाईकोर्ट का फैसला
हाईकोर्ट ने माना कि यह साधारण मामला नहीं है। पति द्वारा नॉन-एक्सेस से जुड़ी ठोस दलीलें पेश की गई हैं। ऐसे में धारा 112 की धारणा rebuttable है और DNA टेस्ट सच्चाई तक पहुंचने के लिए जरूरी है। कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश में कोई त्रुटि नहीं पाई।
